आँचल

उसके आँचल में दो पल सो जाऊँ, उस धुन में कुछ पल के लिए खो जाऊँ।

ओस की चादर में उगता आफ़ताब देखता हूँ
जाँनिसार हो जिस पर उसे मिलने का मैं ख़्वाब देखता हूँ
जो मिल ही जाऊँ तो मोह का बीज उस मिट्टी में बो आऊँ
उसके आँचल में दो पल सो जाऊँ, उस धुन में कुछ पल के लिए खो जाऊँ।

बातें हों ऐसी जैसे रूह को रूह पहचान ले
पूछे जो कोई के किसने जानी तेरे मन की बात तो हर साँस बस उसी का नाम ले
उसकी गलियों में एक मर्तबा जाकर बस वहीं का हो जाऊँ
उसके आँचल में दो पल सो जाऊँ, उस धुन में कुछ पल के लिए खो जाऊँ।

लड़खड़ाना और संभलना सब हो साथ में
कभी भागें एक-दूजे से दूर पर सुकून मिले बस इस नात में
ऐसा हमदम जो मिल जाए तो क्या कैलाश को आँखों से धो आऊँ
उसके आँचल में दो पल सो जाऊँ, उस धुन में कुछ पल के लिए खो जाऊँ।

हर रोज़ बस उसकी मौजूदगी से दिन बन जाए
कुछ छेड़-छाड़ करूं मैं उससे जो बग़ल में वो आए
एक उम्र उसकी बाहों में गुज़ारकर उसके आग़ोश में बस खो जाऊँ
उसके आँचल में दो पल सो जाऊँ, उस धुन में कुछ पल के लिए खो जाऊँ।

सामान

ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

थी बेचैनी सता रही जो उसकी याद आई थी
न जाने क्यों हवा में उसकी मुश्क भी छाई थी
जो क़ैद था कहीं वो सैलाब उमड़ आया था
ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

ख्वाहिश थी कि वही हम हों और हो वही तन्हाई
बात पर रही वही जो वो कभी नहीं समझ पाई
था मेरा ही क़सूर शायद जो मैं उसकी झिझक न समझ पाया था
ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

बोली के वक्त बहुत गुज़र गया हो जाऊँगी अब किसी और की
था जो भी दरम्यान हमारे थी कहानी वो किसी दौर की
सुनते ही ये सब फ़िर वो दीवाना आश़िक बौखलाया  था
ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

पूछा जो कि रह लेगी क्या मुझे भुलाकर किसी और के साथ
बोली के अब रब की है यही मर्ज़ी, ये डोर न रही मेरे हाथ
हमारी तक़दीर लिखने वाली के हाथ अपनी उम्मीद टूटते देख मैं मन ही मन मुस्काया था
ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

बात फ़िर रही अधूरी क्योंकि फ़िर वही बात थी
मैं उसके लिए सब छोड़े था और इसकी उसकी नज़रों में न कोई औक़ात थी
कांटे भी पर अब सब मिट गए जो वो गुलाब उसने जड़ से ही हटाया था
ज़हन के संदूक़ से निकला था सामान जो उसे दिखाया था, अच्छा हुआ उसने सब ख़ाक किया जो मैंने उसके इश़्क में कमाया था।

खामोशी

खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

एक सफ़र पर तेरे साथ हूँ और सुनता हूँ एक ऐसी धुन
बग़ल में हम बैठे हैं और हमारी उंगलियाँ गई हैं बुन
तेरी मौजूदगी में, हर पल और हसीन बन जाता है
खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

वो पल के जब तूने प्याली लबों से अपने लगाई
अपनी प्याली छोड़ मैंने, नमी तेरे लबों से चुराई
तब से बस मुझे अब तेरी बनाई चाय का स्वाद भाता है
खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

लिपट गई जो तू मुझसे दौड़कर उस सड़क पर
रोम-रोम बहक गया और काबू रहा न मेरा अपने पर
असर है ये तेरा जो मुझे दीवाना इस क़दर बनाता है
खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

कहा है कुछ तूने मेरे कानों में, मुस्कान चेहरे पर जो आई है
यूँ तो घबराती है तू पर अभी शर्म मेरे चेहरे पर छाई है
ऐसी छेड़-छाड़ में हमारी, मुझे ज़िन्दगी का मज़ा आता है
खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

आफ़ताब अलविदा कह चला और रात की चादर उड़ आई
जाना कि एक और ख़्वाब जी लिया, मदहोशी जो मैंने गंवाई
बेरुख़ होता है जब हक़ीक़त से, दिल ऐसे ही सुकून पाता है
खामोशी में मुझे तू सुन जाता है, तेरा ज़िक्र मेरे ख़्यालों में अक्सर आता है।

ज़िन्दगी का एक रंग

फ़िर ऐतबार करने की अब कोशिश कर आब, दंग़ा भी ज़िन्दगी का एक रंग है।

बिखर गए थे जो वो टुकड़े अब समेट ले
अपने रिसते ज़ख्मों को मोहब्बत की पट्टी में लपेट लें
वफ़ा को शिद्दत से निभाना ही तेरी मोहब्बत का ढ़ंग है
फ़िर ऐतबार करने की अब कोशिश कर आब, दंग़ा भी ज़िन्दगी का एक रंग है।

बेरुख़ हो जो छोड़ गए हैं राह तेरी
मान ले कि अब भी दिल में मिली है उन्हें पनाह तेरी
हर दम लड़ ले ख़ुद से जो ये बुनियादी जंग है
फ़िर ऐतबार करने की अब कोशिश कर आब, दंग़ा भी ज़िन्दगी का एक रंग है।

पत्थर है बस वो महताब जिसकी दीवाने को ख्वाहिश थी
था उसका कसूर नहीं वो तो तेरी अपने इश्क़ की नुमाइश थी
क्यों तू भूल गया ये और इस अदना बात पर दंग है
फ़िर ऐतबार करने की अब कोशिश कर आब, दंग़ा भी ज़िन्दगी का एक रंग है।

आज़ाद हो जाएगा

ये बातों-बातों में आबाद हो जाएगा, मेरा दिल तेरी आशिक़ी में क़ैद होकर आज़ाद हो जाएगा।

तेरी मौजूदगी से एक मुस्कान आ जाती है चेहरे पर
न जाने क्यों दिल चाहता है कि बैठा रहे ये तेरे दर
अर्ज़ी लिखता है कि अब छू ले इसे वरना बर्बाद हो जाएगा
ये बातों-बातों में आबाद हो जाएगा, मेरा दिल तेरी आशिक़ी में क़ैद होकर आज़ाद हो जाएगा।

आजकल एक अजब सी हलचल मन में रहती है
तुझे मिलने की बेचैनी रंगों में लहू बनकर बहती है
थाम ले मुझे वरना मेरा मुझसे फ़साद हो जाएगा
ये बातों-बातों में आबाद हो जाएगा, मेरा दिल तेरी आशिक़ी में क़ैद होकर आज़ाद हो जाएगा।

गुल से खिले गालों पर जान निसार है
ये दिल अब इन आँखों की शोख़ियों का बीमार है
इस मर्ज़ में मरकर ही ये हयात पाएगा
ये बातों-बातों में आबाद हो जाएगा, मेरा दिल तेरी आशिक़ी में क़ैद होकर आज़ाद हो जाएगा।

महताब और आब

झिझक थी उन आँखों में बात जो लबों तक आई थी, टूटकर बिखर गई सब चिलमन उसने नज़र जो मिलाई थी।

सितारों की महफ़िल में नज़र आया वो महताब
देख उस दिलनशीं को बस मचल उठा था आब
किसी तरह बस संभला दिल उसने झलक ऐसी दिखलाई थी
झिझक थी उन आँखों में बात जो लबों तक आई थी, टूटकर बिखर गई सब चिलमन उसने नज़र जो मिलाई थी।

था नज़ारा कुछ ऐसा कि बात बेकाबू हो चली थी
मैं दीवाना हो गया और वो अपने ग़ुरूर में तनी थी
उकसाने को सैलाब वो कुछ बादल भी लाई थी
झिझक थी उन आँखों में बात जो लबों तक आई थी, टूटकर बिखर गई सब चिलमन उसने नज़र जो मिलाई थी।

है ये भी ज़रूरी कि दरम्यान कोई डोर हो
कशमकश चलती रहे और मौजों का न कोई छोर हो
कुछ ही पल में वो आब का अक्स नज़र आई थी
झिझक थी उन आँखों में बात जो लबों तक आई थी, टूटकर बिखर गई सब चिलमन उसने नज़र जो मिलाई थी।

अप्पा

बेमतलब बस अपना फर्ज़ निभाऊँगा, शायद कभी मैं भी अप्पा सा बन पाऊँगा।

कहते हैं सब कि इंसान अपने मतलब के लिए जीता है
शायद मिला नहीं उन्हें कोई जो बस नेकी का जाम पीता है
माँगे जो कोई सबूत तो अपने अप्पा से मिलाऊँगा
बेमतलब बस अपना फर्ज़ निभाऊँगा, शायद कभी मैं भी अप्पा सा बन पाऊँगा।

अर्से पहले की बात है एक बल्ला मँगाया था
थे हालात जो भी उसे शाम को यारों में दिखाया था
अपने अज़ीज़ों के अरमानों को कुछ ऐसे पूरा कर जाऊँगा
बेमतलब बस अपना फर्ज़ निभाऊँगा, शायद कभी मैं भी अप्पा सा बन पाऊँगा।

दस्तूर है कि दुनिया में ठेस तो लगेगी
जिनसे मरहम की उम्मीद हो उन्हीं से टीस भी जगेगी
अपने हर क़ातिल का पर मैंं शुक्रगुज़ार बन जाऊँगा
बेमतलब बस अपना फर्ज़ निभाऊँगा, शायद कभी मैं भी अप्पा सा बन पाऊँगा।

मैं हर बात मानता हूँ उनकी ऐसी तो कोई बात नहीं
नोक-झोंक बहुत होती है हमारे बीच इसपर भी कोई रात नहीं
ख्वाहिश है बस कि इस अनुभव को जी भर जी जाऊँगा
बेमतलब बस अपना फर्ज़ निभाऊँगा, शायद कभी मैं भी अप्पा सा बन पाऊँगा।